Sunday, 13 June 2021

जो सारा जीवन आग रहा है

रात रात जो जाग रहा है 
इधर उधर वो भाग रहा है
कैसे पल भर में ठंडा हो जाए
जो सारा जीवन आग रहा हैं

ज्वालाओं को लिए समेटे
जो कुछ बौनों की खातिर
हर झंझट से टकराता है
जैसे लडता है योद्घा सातिर

मुश्किल को यदि पार कर गया
तो विजय स्वयं ही पा जाएगा
देख रहा नित जो खुली आंख से
उन सपनों का कल पल आएगा

पं.अश्वनी मिश्रा

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