रात रात जो जाग रहा है
इधर उधर वो भाग रहा है
कैसे पल भर में ठंडा हो जाए
जो सारा जीवन आग रहा हैं
ज्वालाओं को लिए समेटे
जो कुछ बौनों की खातिर
हर झंझट से टकराता है
जैसे लडते हों योद्घा सातिर
मुश्किल को यदि पार कर गया
तो विजय स्वयं ही पा जाएगा
देख रहा नित जो खुली आंख से
उन सपनों का कल पल आएगा
पं.अश्वनी मिश्रा
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