Friday, 4 August 2023

रोजमर्रा की जरुरत नौकरी है क्या

इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए अगर नौकरी करना है तो आत्मसम्मान बेंच दो या गिरवी रख दो क्योंकि इस समय जो चलन में हैं उसके साथ ना तो आपका आत्मविश्वास बचेगा ना आत्मसम्मान जगह जगह दोनों का उपहास उड़ेगा और ठेस पहुंचाई जाएगी 
युग कालनेमी जगह जगह राम राम रटते मिलेंगें !!
नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट लम्बी तभी चलेगी जब आप उस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनेंगें , अगर आपके मन में किंतु परंतु , क्या ,कैसे क्यों जैसे प्रश्नवाचक विचार मन में आए वहीं पर आपकी रफ्तार को हलंत , अल्पविराम या पूर्ण विराम लगने लगेगा..
खैर अगर आपकी दैनिक आवश्यक्ता बिना मजदूरी के नहीं पूरी हो सकती तो मौखिक रुप से अपंग रहने में ही भलाई है
मतलब मूक बधिर बनकर चुपचाप घोड़े की तरह आंखों पट्टी मुंह पर लगाम लगा लो और चाबुक पड़ते ही उस दिशा में भागने के लिए तैयार रहो जिस दिशा में लगाम खींची गई हो
अगर लगाम सही हाथों में होगी तो या तो दौड़ जितवा देगी या फिर टांग तुड़वा देगी , बस शक्ति ,सामर्थ ऊर्जा अपनी व्यय होगी ..!! 
वैसे इस काल्पनिक दुनिया में भौतिकतवादिता का जो भयंकर खेल चल रहा ..वो खुली आंखों से भीड़भाड के बीच तो नहीं दिखने वाला , उसके लिए आपको एकांत में आंखें बंद करके एकाग्रता के साथ ही देखना होना ।
वैसे एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि इतने प्रयोगात्मक ना बने 
कि समाने वाले मानव या अन्य जीव के नैतिक मूल्यों का हनन शुरु कर दें उनकी भावनाओं के साथ आप प्रयोग करने लगें
आज कल आए दिन देखता हूं अजब प्रतिस्पर्धा शुरु है अपने से छोटे मनुष्य को नीचा दिखाने की , जबरदस्ती अपने रुतबे को उसके ऊपर थोपने की एक साधारण मनुष्य को भौतिकता के पहाड़ के नीचे दबाने की इस मानसिकता से ना जाने कितने लोग प्रभावित हैं दैनिक जीवन में ..!!
खैर जीविका के लिए मनुष्य कुछ तो करेगा ही वैसे भी कहा गया है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज का निर्माण सिर्फ एक व्यक्ति , एक वर्ग या एक तरह के लोगों से नहीं होता समाज बनता है हर वर्ग को हर तरह के व्यक्तियों के समूह से तो इस समन्वय को बनाए रखें 
सब कुछ मनुष्य की सोंच पर निर्भर नहीं करता ना सब कुछ उसकी अभिलाषा के अनुरुप हो सकता इस श्रृष्टि को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने की कुछ जिम्मेदारी प्रकृति की भी है 
और मनुष्य या अन्य जीव भले ही अपनी प्रवृत्ति बदल लें प्रकृति हमेशा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन बड़ी खूबसूरती से करती है वो संतुलन बनाना जानती है उसे अपना दायित्व पता है काश हम मनुष्य भी अपनी मानवता के दायित्व का सुव्यवस्थित ढंग से निर्वाहन करना सीख लें
संतुलन जरुरी है इसलिए आप भी संयमित रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे ऐसी आशा के साथ ...आप सभी को सहृदय धन्यवाद 🙏 पं.अश्वनी मिश्रा






अल्पबुद्धि बनाम मंदबुद्धि

वैसे तो इस संसार में सब एक से बड़ कर एक परम ज्ञानी लोग मौजूद हैं पर अपने आस पास हुए घटना चक्र को समझने का प्रयास करेंगे तो आपको भिन्न भिन्न प्रकार के ज्ञानी मिलेंगें जिनमें से कुछ का वर्गीकरण मैंने भी किया है ...
जिनमें से परम् ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ है जिन्हें हम अपनी भाषा में महान का दर्जा दे चुके होते हैं जैसे वो साधू , संत जिन्होंने अपना सबकुछ ईश्वर को समर्पित कर दिया इस सांसारिक माया मोह का उन पर प्रभाव नहीं है वो दुर्लभ देव पुरुष हमें कभी कभी ही देखने को मिलते हैं 
दूसरे वो हैं जो ज्ञानी लोग हैं जिन्होंने समाज में रह कर समाज को सुधारने का विणा उठाया है समाज के महान विचारक , कथावाचक , साधू संत जो प्राय: हमें शांति सन्देश देते मिल जाते हैं समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा का प्रचार प्रसार करते मिल जाते हैं आज कल ऐसे लोगों की समाज को बहुत जरुरत यही वो लोग हैं जो नकारात्मकता घृणा अशांति को समाज से दूर कर सकते हैं तो ऐसे व्यक्ति जहां पर भी मिलें उन्हें पूरा सम्मान दें और जो भी सीख सकते हैं उनसे सीखने का प्रयास करें 
तीसरे हैं समझदार वैसे यह काफी मात्रा में मौजूद हैं इन्हें ना तो कुछ अच्छा दिखता है ना बुरा यह अपने में ही मस्त होते है मेरे हिसाब से शून्य किंतु यह वही होते हैं जो स्वयं के हित का कोई  मौका नहीं छोड़ते और एक रौबदार जीवन के लिए निरंतर गतिशील रहते हैं 
अब आते हैं अल्पबुद्धि लोग असल में यह वो लोग हैं जिनको समाजिक तौर पर घटित हर घटना प्रभावित करती है यह आम  भाषा में समाज का मध्यम वर्ग या निम्न वर्ग हो सकता है
इस प्रकार के मनुष्य निरंतर अपनी जीविका चलाने के लिए ही  प्रयत्नशील रहते हैं वैसे तो यह एक बहुत बड़ा वर्ग है जिसमें लोग समझते सबकुछ हैं किंतु कर कुछ भी नहीं सकता अगर इन्हें कोल्हू का बैल कहा जाए तो अतिश्योक्ति ना होगी क्योंकि दिन के शुरूआत से सूर्यास्त तक यह वर्ग सिर्फ यह समझने में लगा रहता है कि अगले पल क्या होगा , जो घटना अभी घटी वो क्यों घटी इन सब प्रश्नों का उत्तर खोजते खोजते इनका पूरा जीवन निकल जाता है खैर...
अब बात करते हैं अंतिम वर्ग की जिसे हम मंदबुद्धि कह रहे हैं
यह वर्ग भी बहुतायत मात्रा में मौजूद है , वैसे अगर देखा जाए तो यह कोई विशेष वर्ग नहीं है लेकिन वर्ग विशेष जरुर है इनके द्वारा किए गए कृत्य का पूरे सामाजिक ढांचें पर प्रभाव पड़ता है वैसे इस वर्ग को भी शाखाओं में बांटा जा सकता है जिसमें प्रमुख रुप से महान मंदबुद्धि , वरिष्ठ मंदबुद्धि , अल्प मंदबुद्धि वो पूर्ण मंदबुद्धि प्रमुख हैं 
इस वर्ग में के लोगों का आपसी टकराव जग जाहिर है यहां एक तरह की प्रतिस्पर्धा चलती है कि मंदबुद्धियों में श्रेष्ठ कौन बनेगा इसको लेकर हम नित नए नए सामाजिक टकराव देखते हैं परिणाम स्वरूप हिंसा भी देखने को मिलती है 
कभी कभी क्या ज्यादातर इस वर्ग का झगड़ा अल्पबुद्धि वर्ग से भी होता रहता है नतीजा आप आए दिन किसी ना किसी माध्यम से देखते ही होंगे कभी कभी खुद को भी प्रभावित महसूस समझते होंगें !!
खैर इस सामाजिक ताने बाने को बुनने के लिए यह सभी वर्ग आवश्यक हैं 
किंतु समाज में शांति बनाए रखने के लिए ज्ञानी लोगों का होना अतिआवश्यक है इससे भी ज्यादा ज़रूरी है इस वर्ग का मुखर होना , ताकि अल्पज्ञानी लोग भी समझदार बन सकें और रही बात मंदबुद्धि वर्ग की तो उनको स्वयं बुद्ध भी नहीं शुद्ध कर सकते बांकि सभी वर्गों को जरुरत है ऐसे लोगों से सावधान रहें सतर्क रहें और सुरक्षित रहें शांति बनाए रहें 
और अपना आंकलन स्वयं करलें की आप कौन से वर्ग में आते हैं ।। 
सहृदय धन्यवाद 🙏
पं.अश्वनी मिश्रा