इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए अगर नौकरी करना है तो आत्मसम्मान बेंच दो या गिरवी रख दो क्योंकि इस समय जो चलन में हैं उसके साथ ना तो आपका आत्मविश्वास बचेगा ना आत्मसम्मान जगह जगह दोनों का उपहास उड़ेगा और ठेस पहुंचाई जाएगी
युग कालनेमी जगह जगह राम राम रटते मिलेंगें !!
नौकरी सरकारी हो या प्राइवेट लम्बी तभी चलेगी जब आप उस भ्रष्ट सिस्टम का हिस्सा बनेंगें , अगर आपके मन में किंतु परंतु , क्या ,कैसे क्यों जैसे प्रश्नवाचक विचार मन में आए वहीं पर आपकी रफ्तार को हलंत , अल्पविराम या पूर्ण विराम लगने लगेगा..
खैर अगर आपकी दैनिक आवश्यक्ता बिना मजदूरी के नहीं पूरी हो सकती तो मौखिक रुप से अपंग रहने में ही भलाई है
मतलब मूक बधिर बनकर चुपचाप घोड़े की तरह आंखों पट्टी मुंह पर लगाम लगा लो और चाबुक पड़ते ही उस दिशा में भागने के लिए तैयार रहो जिस दिशा में लगाम खींची गई हो
अगर लगाम सही हाथों में होगी तो या तो दौड़ जितवा देगी या फिर टांग तुड़वा देगी , बस शक्ति ,सामर्थ ऊर्जा अपनी व्यय होगी ..!!
वैसे इस काल्पनिक दुनिया में भौतिकतवादिता का जो भयंकर खेल चल रहा ..वो खुली आंखों से भीड़भाड के बीच तो नहीं दिखने वाला , उसके लिए आपको एकांत में आंखें बंद करके एकाग्रता के साथ ही देखना होना ।
वैसे एक बात और जोड़ना चाहूंगा कि इतने प्रयोगात्मक ना बने
कि समाने वाले मानव या अन्य जीव के नैतिक मूल्यों का हनन शुरु कर दें उनकी भावनाओं के साथ आप प्रयोग करने लगें
आज कल आए दिन देखता हूं अजब प्रतिस्पर्धा शुरु है अपने से छोटे मनुष्य को नीचा दिखाने की , जबरदस्ती अपने रुतबे को उसके ऊपर थोपने की एक साधारण मनुष्य को भौतिकता के पहाड़ के नीचे दबाने की इस मानसिकता से ना जाने कितने लोग प्रभावित हैं दैनिक जीवन में ..!!
खैर जीविका के लिए मनुष्य कुछ तो करेगा ही वैसे भी कहा गया है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज का निर्माण सिर्फ एक व्यक्ति , एक वर्ग या एक तरह के लोगों से नहीं होता समाज बनता है हर वर्ग को हर तरह के व्यक्तियों के समूह से तो इस समन्वय को बनाए रखें
सब कुछ मनुष्य की सोंच पर निर्भर नहीं करता ना सब कुछ उसकी अभिलाषा के अनुरुप हो सकता इस श्रृष्टि को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने की कुछ जिम्मेदारी प्रकृति की भी है
और मनुष्य या अन्य जीव भले ही अपनी प्रवृत्ति बदल लें प्रकृति हमेशा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन बड़ी खूबसूरती से करती है वो संतुलन बनाना जानती है उसे अपना दायित्व पता है काश हम मनुष्य भी अपनी मानवता के दायित्व का सुव्यवस्थित ढंग से निर्वाहन करना सीख लें
संतुलन जरुरी है इसलिए आप भी संयमित रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे ऐसी आशा के साथ ...आप सभी को सहृदय धन्यवाद 🙏 पं.अश्वनी मिश्रा