बडी़ तकलीफ हैं देती किसीकी ये अदांए
कोई सिद्दत.से काटता है हंस कर सजाएं
वक्त बेवक्त दिल दुखता ही रहता है यहाँ जब
बेवफाई के बोझ से घुट रहीं हैं अब फिजाएं
दोष किसको दें बताओ जख्म ये किसको दिखाएं
बन गया जो रिश्ता जबरदस्ती में बोलो क्यों निभाएं
जब चलने का मन में तुम्हारे हौसला ही नहीं था
तो बताओ इस सफर में हम साथ तेरे क्यों जाएंँ
रास्ते जब हो गए हैं अलग तो सुनो खत्म कर दो
बचा जो दरमियाँ अपने क्यों ना उससे निजात पाएं
पं.अश्वनी मिश्रा
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