Kavi Ashwani Mishra
Tuesday, 12 October 2021
मेरे जैसे कवि
पता नहीं आज कल यहां कहां कहां घूमते हैं मेरे जैसे कवि
अब यहां सियासतदानों के कसीदों में झूमते हैं मेरे जैसे कवि
पाठ दुनिया को पढ़ाते हैं खुद्दारी का मगर सच यह भी है सुनो
मंचों की खातिर किसके किसके चरण चूमते हैं मेरे जैसे कवि
पं.अश्वनी मिश्रा
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